शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008

याक सच्ची कथा


दादा जी बतौंदा थया

दादा जी बतौंदा थया कि याक बार मैं दगड़ी इनी घटना घटी कि म्येरू मानसिक संतुलन कुछ दिनों तक बिगडिगी थो। दादा जी अग्वाड़ी बतौंदा कि याक दिन मैं सुबेर रोजे की चरौं मंदिर मा गयौं, जनु मैं रोज कुण्डी बिठी पाणी ल्येक तें मंदिर मा चड़ोंदू थो तनी मैंन तै दिन बी गागर उठाई अर मैं पाणी ल्युणां तें कुण्डी की ओर चलीग्यौं। जांदी-जांदी म्यरा मन मा इन बी विचार आईन कि आज रात कुछ देर मा च खुलणी, कनु की सी रोज अफड़ा समय पर जांदा था। पर तै दिन शेत घड़ीन बी तौं तें ध्वका दी दिनी और सी पेली ही कुण्डी जाणा तें तयार ह्वेगीन।

जनी सी कुण्डी पौंछीन तखोकु दृश्य देखीक सी बिहोश पड़ीगीन। थ्वाड़ी देर बाद जब तौं तें होश आई त लोगोंका पूछण पर तौंन जू घटना बताई तीं सुणी तें सबी लोग दंग रैगीन।

तौंन बताई कि जनी मैं पाणी भना तें कुण्डी मा गयौं मैंन द्येखी कि याक जनानी कुण्डी मा च न्ह्येणीं” ‘ तींका लम्बा-लम्बा बाल द्येखीक और शरीरकी बनावट द्येखीक मैं बिहोश ह्वेग्यौं। तौंकी बात पूरी होंदा-होंदा याक पर द्यवता ऐगी अर त्येन बताई कि त्वे तें(दादा जी तें) ते टेम पर तख नी जायुँ चेंदु थो तख सेम मा पार्वती थे न्ह्येणी

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